देवबाबांचे अष्टक

प्रारंभ चैत्रा ऋतू ये वसंता | तो नेम मान्या संता महंता |
चिरंजीव ये पीठ होवोनी आता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || १ ||

घेउनी अवतार ह्या मर्त्यलोका | देऊनी प्रेमा वारी कुशंका |
शंका नको ती मजलागी आता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || २ ||

कल्याण प्रांती वसती करोनी | मलंग हाजी गाजी ठरोनी |
समाधिस्त झालात मच्छिंद्रनाथा | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ३ ||

महात्म्य मोठे गाजे जयांचे | नवसास पावे करिता ब्रिदाचे |
रक्षी करी सार्थ काळाही शास्ता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ४ ||

ऊदीनाम बाहे घेता जयांसी | विभूत बाधा पळवी भूतांसी |
होईल आराम रोग्यासी देता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ५ ||

पाहोनी दाढी जटा वाढलेली | गमेची शंभो त्रयनेत्र भाळी |
मदनांतकारी दासासी त्राता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ६ ||

आद्यंतही सत्य नसे हो जयासी | आहे हिरा दिव्या स्वयंप्रकाशी |
होवोनी भक्ता सुखशांती दाता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ७ ||

गोरक्ष रक्षा अघाब्धी भक्षा | देईल मोक्षा धरी शुद्ध पक्षा |
पुरवी अपेक्षा सर्वज्ञ होता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ८ ||

नारायणासी पदी भालदारी | स्थापोनी रक्षी कर ठेवी शिरी |
करवोनी घ्यावी सेवा अनंता | नमस्कार साष्टांग गोरक्षनाथा || ९ ||

निरालस्य सप्रेम सेवा घडावी | अनंता तुझे पायी भक्ती जडावी |
ध्यावे तुला नित्य प्रेमेची नाथा | देई मला हा वर रक्ष आता || १० ||

अलख निरंजन गोरक्षनाथ महाराज की जय!